हरियाणा में सरकारी स्कूलों और कॉलेजों पर मंडराता संकट, घटते दाखिले सरकार की शिक्षा नीति पर गंभीर सवाल : राजबीर सिंह भारतीय




आठवीं बार बढ़ानी पड़ी कॉलेजों में दाखिले की अंतिम तिथि, एक नवंबर तक मिलेगा अवसर; शिक्षकों की कमी, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और निजीकरण की नीति की निष्पक्ष समीक्षा की मांग:

चंडीगढ़/हरियाणा, 23 अक्टूबर 2026।

हरियाणा के सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में घटते दाखिलों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं ऑफिस ऑफ एडवोकेट जनरल, हरियाणा हाईकोर्ट, चंडीगढ़ के सेवानिवृत्त सुपरिंटेंडेंट एवं अध्यक्ष, चंडीगढ़ प्रदेश, ऑल इंडिया अम्बेडकर महासभा रजि.  राजबीर सिंह भारतीय ने कहा कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार को अब गंभीर आत्ममंथन करने की जरूरत है। शैक्षणिक सत्र 2026-27 में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के स्नातक (यूजी) एवं स्नातकोत्तर (पीजी) पाठ्यक्रमों में दाखिले की अंतिम तिथि आठवीं बार बढ़ाकर एक नवंबर किए जाने से शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

उन्होंने कहा कि बार-बार दाखिले की तारीख बढ़ाना विद्यार्थियों को अतिरिक्त अवसर देने के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन इससे मूल समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकार और उच्चतर शिक्षा विभाग को निष्पक्ष जांच करानी चाहिए कि आखिर विद्यार्थी सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से दूर क्यों हो रहे हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो खाली सीटों की समस्या आने वाले वर्षों में और गंभीर हो सकती है।

सरकारी स्कूलों में भी लगातार घट रही बच्चों की संख्या:

राजबीर सिंह भारतीय ने कहा कि चिंता केवल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है। लोगों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों के अनुसार, कई सरकारी स्कूलों में भी विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही है। उन्होंने अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके परिचित स्कूल में हर वर्ष पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 50 विद्यार्थी कम होने की बात सामने आई है। प्राथमिक विद्यालयों में भी बच्चों की संख्या घटने की शिकायतें मिल रही हैं।

उन्होंने कहा कि इस स्थिति के पीछे के कारणों का आंकड़ों के आधार पर अध्ययन होना चाहिए। सरकार को यह देखना चाहिए कि क्या सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, शिक्षा की गुणवत्ता, अभिभावकों की आर्थिक स्थिति, निजी स्कूलों के प्रति बढ़ता रुझान अथवा सरकारी नीतियां दाखिलों को प्रभावित कर रही हैं।

अस्थायी शिक्षकों के भरोसे शिक्षा व्यवस्था कब तक?:

श्री भारतीय ने कहा कि स्कूलों और कॉलेजों में कौशल, रोजगार अथवा अन्य अस्थायी व्यवस्थाओं के माध्यम से शिक्षकों की नियुक्ति किए जाने पर भी गंभीर समीक्षा जरूरी है। जिस शिक्षक की नौकरी और भविष्य अनिश्चित हो, उससे स्थायी शैक्षणिक वातावरण और दीर्घकालिक शैक्षणिक जिम्मेदारियों की अपेक्षा करना कठिन हो सकता है।

उन्होंने कहा कि सरकार को स्थायी एवं योग्य शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में प्राचार्यों, प्रोफेसरों, प्राध्यापकों तथा अन्य शैक्षणिक एवं गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों के रिक्त पद समयबद्ध तरीके से भरे जाने चाहिए। शिक्षकों को नौकरी की सुरक्षा, सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए जरूरी है।

क्या कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर भी घटते दाखिलों की वजह है?:

राजबीर सिंह भारतीय ने सरकार से सवाल किया कि क्या प्रदेश के सभी कॉलेजों के पास पर्याप्त और स्थायी भवन उपलब्ध हैं? क्या विद्यार्थियों को आधुनिक प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, स्वच्छ पेयजल, साफ-सुथरे शौचालय, खेल मैदान, कैंटीन, सुरक्षित परिसर और पढ़ाई के अनुकूल वातावरण मिल रहा है?

उन्होंने कहा कि सरकार को प्रत्येक कॉलेज की आधारभूत सुविधाओं का सर्वेक्षण कराना चाहिए। यह भी जांच होनी चाहिए कि कहीं कोई संस्थान सीमित कमरों, अस्थायी शेड, धर्मशाला, सामुदायिक केंद्र, पंचायत घर या अन्य सार्वजनिक भवनों में तो संचालित नहीं हो रहा है। यदि किसी संस्थान में उच्च शिक्षा के लिए जरूरी सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं होंगी, तो विद्यार्थियों का वहां दाखिला लेने के प्रति आकर्षण कम होना स्वाभाविक है।

उन्होंने कहा कि कॉलेज केवल इमारत का नाम नहीं, बल्कि विद्यार्थियों, योग्य शिक्षकों, गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रमों और बेहतर शैक्षणिक वातावरण का केंद्र होता है।

क्या बेहतर भविष्य की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं विद्यार्थी?

श्री भारतीय ने कहा कि इस संभावना की भी जांच होनी चाहिए कि हरियाणा के विद्यार्थी बेहतर शिक्षा, आधुनिक सुविधाओं, रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रमों और बेहतर अवसरों की तलाश में दूसरे राज्यों के कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में प्रवेश तो नहीं ले रहे हैं।

उन्होंने मांग की कि सरकार पिछले वर्षों के दाखिला आंकड़ों, खाली सीटों, स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या, कॉलेज छोड़ने वाले विद्यार्थियों और दूसरे राज्यों में प्रवेश लेने के रुझानों का तुलनात्मक अध्ययन कराए। इसके आधार पर ऐसी नीति बनाई जाए जिससे हरियाणा के युवाओं को अपने प्रदेश में ही गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा मिल सके।

सरकारी संस्थानों को मजबूत करने के बजाय निजी संस्थानों पर निर्भरता क्यों?

राजबीर सिंह भारतीय ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को मजबूत करना होनी चाहिए। यदि सरकारी संस्थानों में पर्याप्त शिक्षक, बेहतर भवन, आधुनिक सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी, तो अभिभावक स्वाभाविक रूप से निजी संस्थानों की ओर रुख कर सकते हैं।

उन्होंने निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के प्रवेश के लिए दी जाने वाली सहायता का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पर्याप्त शिक्षक और बेहतर सुविधाएं मिलें। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए सहायता योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उनके साथ-साथ सरकारी शिक्षण संस्थानों के सुधार पर भी समान गंभीरता से निवेश किया जाना चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा हालात में सरकारी शिक्षण संस्थानों की कमजोरियों का लाभ निजी संस्थानों को मिल सकता है। इसलिए सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी शिक्षा नीति का उद्देश्य सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है या धीरे-धीरे निजी संस्थानों पर निर्भरता बढ़ाना। इस विषय पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सरकारी खर्च, नियुक्तियों, सुविधाओं और दाखिला आंकड़ों की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।

शिक्षा बजट बढ़े, रोजगारपरक शिक्षा को मिले बढ़ावा/

श्री भारतीय ने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी मजबूत लोकतंत्र तथा विकसित समाज की बुनियाद हैं। सरकार को शिक्षा बजट में पर्याप्त वृद्धि कर स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, विद्यार्थियों को ऐसे कौशल और रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम उपलब्ध कराए जाने चाहिए जो उन्हें वर्तमान रोजगार बाजार की जरूरतों के अनुरूप तैयार कर सकें।

उन्होंने कहा कि केवल नए कॉलेज खोलने या घोषणाएं करने से शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी। मौजूदा संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति, भवनों का रखरखाव, प्रयोगशालाओं का आधुनिकीकरण, पुस्तकालयों का विकास और विद्यार्थियों की समस्याओं का समाधान भी उतना ही जरूरी है।

पांच से सात वर्षों में गंभीर हो सकते हैं परिणाम:

राजबीर सिंह भारतीय ने चेतावनी दी कि यदि विद्यार्थियों की घटती संख्या, खाली सीटों और सरकारी शिक्षण संस्थानों की समस्याओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले पांच से सात वर्षों में उच्च शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों की नियुक्तियों और संस्थानों के संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों की संख्या लगातार घटने पर प्राध्यापकों, प्रोफेसरों, प्राचार्यों तथा शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के पदों एवं भूमिकाओं पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक आकलन दाखिला रुझानों, संस्थानों की जरूरतों और सरकारी भर्ती नीति के आधार पर किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थी ही नहीं होंगे और शिक्षकों के पद खाली रहेंगे, तो शिक्षा व्यवस्था की उपयोगिता और प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसलिए सरकार को समस्या के मूल कारणों को समझकर समयबद्ध सुधार लागू करने चाहिए।

सरकार से निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई की मांग:

राजबीर सिंह भारतीय ने हरियाणा सरकार और उच्चतर शिक्षा विभाग से मांग की कि—

1. सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में घटते दाखिलों के कारणों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
2. रिक्त शैक्षणिक पदों को भरने के लिए समयबद्ध योजना बनाई जाए और स्थायी शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
3. स्कूलों एवं कॉलेजों के भवनों, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, पेयजल, शौचालयों और अन्य बुनियादी सुविधाओं का सर्वेक्षण कराया जाए।
4. दूसरे राज्यों में प्रवेश लेने वाले हरियाणा के विद्यार्थियों के रुझान और उसके कारणों का अध्ययन किया जाए।
5. सरकारी स्कूलों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों को मजबूत करने के लिए शिक्षा बजट और संसाधनों में पर्याप्त वृद्धि की जाए।
6. अस्थायी नियुक्तियों पर निर्भरता कम करने, रोजगारपरक पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देने और विद्यार्थियों के लिए बेहतर शैक्षणिक वातावरण तैयार करने की नीति बनाई जाए।

राजबीर सिंह भारतीय ने कहा, “खाली होती सीटें केवल शिक्षा विभाग के आंकड़े नहीं, बल्कि हरियाणा के युवाओं के भविष्य से जुड़ी गंभीर चेतावनी हैं। सरकार को समय रहते आत्ममंथन करना होगा। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को कमजोर छोड़कर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत नहीं बनाया जा सकता। यदि हमें युवाओं का भविष्य सुरक्षित करना है, तो सरकारी शिक्षा संस्थानों को मजबूत करना, योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।”


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