जहाँ सुशासन पर राजनीतिक दिखावा हावी हो जाता है,जमीनी हकीकत का एक आईना
पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से स्वेच्छा से मितव्ययिता अपनाने की अपील पहली नजर में समय की आवश्यकता प्रतीत हो सकती है। लेकिन यह घोषणा पाँच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा चुनाव समाप्त होने के तुरंत बाद की गई, जिससे सरकार की दूरदर्शिता और गंभीरता पर स्वाभाविक प्रश्न उठते हैं।
ईंधन के विवेकपूर्ण उपयोग की सलाह कागज़ों में अच्छी लगती है, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। चंडीगढ़ प्रशासन के सांख्यिकीय सार (Statistical Abstract) के अनुसार, “सिटी ब्यूटीफुल” कहलाने वाले चंडीगढ़ में देश में प्रति व्यक्ति वाहनों की संख्या सबसे अधिक है। यहाँ लगभग 13 लाख की आबादी पर 15 लाख से अधिक पंजीकृत वाहन हैं। जब तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सभी वर्गों के लिए सुविधाजनक, सुरक्षित और समय की बचत करने वाली नहीं बनती, तब तक लोग निजी वाहनों को छोड़ नहीं सकते। इसके अतिरिक्त, हमारी सड़कों पर पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित बुनियादी ढाँचे की भारी कमी है, जिससे लोग मजबूरन निजी वाहनों पर निर्भर रहते हैं।
जब देश की लगभग 40 प्रतिशत संपत्ति केवल शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के हाथों में केंद्रित हो — जैसा कि ऑक्सफैम इंडिया की ‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट’ रिपोर्ट में उजागर किया गया — तब बढ़ती ईंधन कीमतें अमीर वर्ग को बहुत अधिक प्रभावित नहीं करतीं। सड़कों पर दौड़ती ईंधन की भारी खपत करने वाली लग्ज़री एसयूवी इस बात का प्रमाण हैं कि संपन्न वर्ग के लिए ईंधन खर्च कोई चिंता का विषय नहीं है। इसका वास्तविक बोझ मध्यम वर्ग पर पड़ता है, जिसके पास सार्वजनिक परिवहन का प्रभावी विकल्प उपलब्ध नहीं है।
यही गहरी असमानता सोने के आयात और निवेश के संदर्भ में भी दिखाई देती है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) और वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, भारत का वार्षिक स्वर्ण आयात बिल लगभग 72 अरब डॉलर (करीब ₹6 लाख करोड़) तक पहुँच चुका है। जहाँ संपन्न वर्ग सोने का उपयोग अघोषित संपत्ति को सुरक्षित रखने के साधन के रूप में कर सकता है, वहीं मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए यह सदियों पुरानी सामाजिक परंपरा और बेटियों के भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में आम नागरिकों से राष्ट्रीय आर्थिक मितव्ययिता के नाम पर विवाह या शुभ कार्य टालने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता।
ऐसे ही विरोधाभास हमारे कृषि क्षेत्र में भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। एक ओर भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदाम गेहूँ और चावल के विशाल भंडार से भरे पड़े हैं, वहीं दूसरी ओर सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) की नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार भारत अपनी खाद्य तेल आवश्यकताओं का लगभग 55 से 60 प्रतिशत आयात करता है, जिस पर प्रतिवर्ष लगभग ₹2 लाख करोड़ खर्च होते हैं। यदि सरकारें समय रहते किसानों को तिलहन फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करतीं, तो इस भारी आर्थिक बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता था।
कोविड-19 महामारी के दौरान देश की कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था भी पूरी तरह उजागर हो गई थी। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल (NHP) के अनुसार भारत में प्रति 1,000 लोगों पर औसतन केवल लगभग 1.3 अस्पताल बेड उपलब्ध हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों से काफी कम हैं। ऐसे में केवल संकट के समय तात्कालिक मितव्ययिता की अपीलें करने के बजाय सरकार को अतीत से सबक लेते हुए दीर्घकालिक और ठोस सुधार लागू करने चाहिए।
देश को मजबूत और सुलभ सार्वजनिक परिवहन, कृषि में व्यापक विविधीकरण तथा सुदृढ़ स्वास्थ्य ढाँचे में बड़े निवेश की आवश्यकता है। जब तक व्यवस्था आम नागरिक के हितों को ध्यान में रखकर मूलभूत रूप से मजबूत नहीं की जाती, तब तक स्वैच्छिक मितव्ययिता की अपीलें केवल आदर्शवादी कल्पना बनकर रह जाएँगी।
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