वार्ड 28 मोहाली में कांग्रेस की रणनीति पर उठे सवाल, क्या मज़बूत चेहरे की कमी से उतारना पड़ा नया उम्मीदवार?
मोहाली नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे वार्ड नंबर 28 का राजनीतिक माहौल भी पूरी तरह गरमा चुका है। इस वार्ड में इस बार सबसे ज्यादा चर्चा कांग्रेस की चुनावी रणनीति और उसके उम्मीदवार चयन को लेकर हो रही है। इलाके में लगातार यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या कांग्रेस के पास वार्ड 28 में कोई मज़बूत, लोकप्रिय और ज़मीनी चेहरा नहीं था, जिसके चलते पार्टी को मजबूरी में अपना नया उम्मीदवार मैदान में उतारना पड़ा?
स्थानीय लोगों और राजनीतिक जानकारों के बीच यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि कांग्रेस इस बार वार्ड 28 में पूरी तरह बैकफुट पर नजर आ रही है। कई लोगों का कहना है कि पार्टी के पास ऐसा कोई प्रभावशाली चेहरा दिखाई नहीं दे रहा, जो जनता के बीच मजबूत पकड़ रखता हो या जिसने लंबे समय तक वार्ड में सक्रिय रहकर लोगों के मुद्दों पर काम किया हो। यही कारण है कि अब जनता खुलकर सवाल पूछ रही है कि आखिर कांग्रेस किस आधार पर चुनाव लड़ रही है।
इलाके के निवासियों का मानना है कि चुनाव केवल पोस्टर और नारों से नहीं जीते जाते, बल्कि जनता के बीच लगातार मौजूद रहने और लोगों की समस्याओं को हल करने से विश्वास बनता है। वार्ड 28 में इस समय जिस नाम की सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है, वह आम आदमी पार्टी के पूर्व एमसी रविंद्र बिंद्रा का है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान वार्ड में कई विकास कार्य करवाए और हमेशा लोगों के बीच सक्रिय रहे। यही वजह है कि आज भी बड़ी संख्या में लोग उन्हें एक मज़बूत और ज़मीनी नेता के रूप में देखते हैं।
कई स्थानीय निवासियों का कहना है कि ने केवल चुनावी समय में नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल के दौरान लोगों की समस्याओं को गंभीरता से उठाया। चाहे सफाई व्यवस्था का मुद्दा हो, गलियों और सड़कों की समस्या हो या आम लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां — उन्होंने लगातार प्रशासन तक लोगों की आवाज पहुंचाने का काम किया। यही कारण है कि इलाके में आज भी उनके समर्थन में सकारात्मक माहौल देखने को मिल रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस को लेकर वार्ड में असमंजस और असंतोष का माहौल बताया जा रहा है। लोगों का कहना है कि यदि कांग्रेस के पास वास्तव में कोई मज़बूत चेहरा होता, तो पार्टी को इस तरह सवालों का सामना नहीं करना पड़ता।
वार्ड के कई बुजुर्ग और युवा मतदाता यह भी कहते नजर आ रहे हैं कि जनता अब केवल बड़े राजनीतिक नामों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि वह ऐसे प्रतिनिधि को चुनना चाहती है जो पांच साल तक जनता के बीच मौजूद रहे। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में वार्ड की राजनीति में ज़मीनी काम करने वाले नेताओं की पहचान साफ़ तौर पर बनी है और जनता उसी आधार पर अपना निर्णय लेने का मन बना रही है।
इलाके में यह चर्चा भी ज़ोरों पर है कि कांग्रेस इस बार वार्ड 28 में स्पष्ट रणनीति के बिना चुनावी मैदान में उतरी है। कई लोगों का मानना है कि पार्टी को उम्मीदवार घोषित करने में भी काफी समय लगा, जिससे यह संदेश गया कि कांग्रेस के पास मजबूत विकल्पों की कमी थी। यही कारण है कि अब राजनीतिक गलियारों में लगातार यह सवाल गूंज रहा है —
“क्या कांग्रेस को वार्ड 28 में कोई मजबूत चेहरा नहीं मिला?”
और
“क्या मजबूरी में नया उम्मीदवार उतारना पड़ा?”
चुनावी माहौल के बीच फिलहाल वार्ड 28 में सबसे ज्यादा चर्चा विकास कार्यों, जमीनी पकड़ और जनता के साथ जुड़े रहने वाले पूर्व पार्षद रविन्द्र बिंद्रा की हो रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस बार चुनाव में वही चेहरा मजबूत साबित होगा, जिसने वर्षों तक जनता के बीच रहकर काम किया हो, न कि केवल चुनावी समय में सक्रिय दिखाई दिया हो। ऐसे में आम आदमी पार्टी के पूर्व एमसी का नाम वार्ड की राजनीति में लगातार केंद्र में बना हुआ है।
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