पंजाब में आरटीआई एक्ट बना मजाक,स्थनीय निकाय विभाग के अधिकरी आरटीआई में नहीं देते जवाब, कार्रवाई करने की बजाए घोटालों पर पर्दे डाल रहा कमीशन, मानसिक परेशान करने के लिए लगाते हैं चार से छह माह की तारीख
जीरकपुर। पंजाब में आरटीआई मजाक बनकर रह गई है। एक तरफ राज्य की पूर्व तथा मौजूदा सरकारें सूचना अधिकार की मजबूती के लिए हर माह लाखों रुपये खर्च कर रही हैं और सूचना आयुक्तों की तैनाती भी की है गई वहीं दूसरी तरफ जानबूझकर आरटीआई का जवाब देने में देरी की जाती है। जिससे आरटीआई लेने का असल उद्देश्य खत्म हो जाता है।
स्थानीय निकाय विभाग से आरटीआई लगाकर कई मुद्दों पर जानकारी मांग रहे जैक रैजीडेंटस वैलफेयर एसोसिएशन के प्रधान सुखदेव चौधरी ने कहा कि वह लंबे समय से स्थानीय निकाय विभाग के पास से पंजीकृत व गैर पंजीकृत कालोनियों की जानकारी मांग रहे हैं। इसके अलावा नगर परिषद से यह पूछा जा रहा है कि उसका बिल्डरों की तरफ ईडीसी के रूप में कितना बकाया खड़ा है। यही नहीं नगर परिषद के अधिकारी आरटीआई में भी यह तक बताने को तैयार नहीं है कि यहां कितने लोग ऐसे हैं जिन्होंने नक्शा पास करवाए बगैर निर्माण किए हैं और बाद में उन्हें नोटिस जारी करके फीस वसूली गई है।
सुखदेव चौधरी ने बताया कि पहले तो इस तरह की जानकारी देने के लिए स्थानीय अधिकारी ही कई-कई महीने तक लटकाते रहते हैं। आज तक सौ के करीब आरटीआई स्थानीय निकाय विभाग से मांग चुके हैं मगर एक भी RTI का जवाब नहीं दिया गया। जब प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास जाते हैं तो वहां पर केस छह से आठ महीने तक फंस जाता है। इसके बाद कमीशन भी इस मामले में दागियों को बचाने में लग जाता है। कमीशन द्वारा भी मामले की सुनवाई के लिए चार से छह महीने की तारीख लगाई जाती है। करीब डेढ से से दो साल की जद्दोजहद के बाद कोई ना कोई कारण बताकर कमीशन द्वारा इस एप्लीकेशन को रद्द कर दिया जाता है। यदि किसी आरटीआई का जवाब मिलता है तब तक उसका मूल उद्देश्य समाप्त हो जाता है। सुखदेव चौधरी ने कहा कि आरटीआई से मिलने वाली सभी जानकारियों को समयबद्ध करने के साथ-साथ कमीशन की कार्यप्रणाली पर भी निगरानी की जरूरत है।
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